कोलकाता, पश्चिम बंगाल – हाल ही में पश्चिम बंगाल में आई भीषण बाढ़ ने राज्य को एक बार फिर से जकड़ लिया है, जिसमें हजारों परिवार प्रभावित हुए हैं। इस प्राकृतिक आपदा के पीछे मानवीय लापरवाही और जल संरक्षण की अनदेखी को एक बड़ी वजह माना जा रहा है।
बांग्लादेश सीमा से लगा इलाका इस बार भी पानी की तबाही का सबसे अधिक शिकार बना है। अक्टूबर के अंत से शुरू हुई बारिश ने नदियों का जलस्तर खतरनाक रूप से बढ़ा दिया है, जिससे प्रमुख इलाकों में बाढ़ के हालात बन गए हैं। नदियों के तल में गाद जमने और जल निकासी के उचित प्रबंध न होने के कारण इस बार की बाढ़ सामान्य से कहीं अधिक गंभीर हो गई है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अब तक लगभग 15 लाख लोग प्रभावित हुए हैं, जिनमें से अधिकतर ग्रामीण क्षेत्र में निवास करते हैं। बाढ़ से फसलें पूरी तरह तबाह हो चुकी हैं, जिससे किसानों की आर्थिक हालत खस्ता हो गई है। वहीं, प्रभावित इलाकों में पेयजल तथा स्वच्छता की समस्या गहराती जा रही है, जिससे संक्रामक रोग फैलने का खतरा बढ़ गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जल प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण के प्रति स्वच्छंद रवैया इस बार की विपदा की सबसे बड़ी वजह है। नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में बाधा डालकर बने अवैध निर्माण और अतिक्रमण ने पानी के बहाव को रोक दिया है। इसके अलावा, बड़ी मात्रा में कूड़ा-कचरा नदियों में फेंका जाना उनके जलस्तर को प्रभावित करता है।
राज्य सरकार द्वारा राहत कार्यों की शुरुआत तो कर दी गई है, लेकिन जमीनी स्तर पर कार्यों में गति और समन्वय की कमी देखी जा रही है। प्रभावितों को तत्काल सहायता पहुँचाने के लिए पर्याप्त व्यवस्थाओं की भी आवश्यकता है। राहत शिविरों में बेहतर संसाधनों के साथ स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार करना जरूरी है।
इस आपदा से सबक लेते हुए जल संरक्षण और सतत विकास को प्राथमिकता देना वक्त की मांग है। साथ ही लोगों को प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करने के लिए जागरूक करना ही भविष्य में ऐसी आपदाओं को कम कर सकता है। समुचित योजना, प्रभावी प्रशासन और जनता की सहमति से ही इस दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव आ सकता है।
पश्चिम बंगाल की बाढ़ ने पुनः साबित किया है कि मानवीय भूल और प्रशासनिक लापरवाही एक प्राकृतिक आपदा को और भयावह बना सकती है। अब समय है जागरूकता और परिवर्तन का, ताकि आने वाले वर्षों में ऐसी स्थिति से बेहतर ढंग से निपटा जा सके।
