Address representation gaps in Sixth Schedule areas: 3 Assam MPs

छठे अनुसूची क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व की कमी दूर करें: असम के 3 सांसद

गुवाहाटी, असम: असम के तीन सांसदों ने छठे अनुसूची क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व की कमी को दूर करने की ضرورت पर जोर दिया है और कहा है कि संवैधानिक पुनर्संरेखण से ऐतिहासिक असंतुलन को ठीक किया जा सकता है और समावेशन को मजबूत किया जा सकता है। उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि केवल जनसंख्या को सीमा निर्धारण का एकमात्र मानदंड बनाना पूर्वोत्तर के लिए अन्यायपूर्ण होगा।

पूर्वोत्तर भारत की भौगोलिक और सामाजिक विविधता को ध्यान में रखते हुए, सांसदों का मानना है कि क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के मुद्दे को संवेदनशीलता से देखने की जरूरत है। छठा अनुसूची उन क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान करता है जहां जनजातीय समुदायों का दबदबा होता है और जो अपनी सांस्कृतिक पहचान और स्वशासन के लिए संवैधानिक सुरक्षा चाहते हैं।

सांसदों ने कहा कि यदि जनसंख्या को एकमात्र आधार बनाकर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनःनिर्धारण किया गया तो यह उन समुदायों के हितों की अनदेखी करेगा जो जनसंख्या में शायद कम हैं, परन्तु ऐतिहासिक रूप से और सांस्कृतिक महत्व के कारण संवैधानिक संरक्षण आवश्यक है। इससे पूर्वोत्तर की राजनीतिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है और क्षेत्रीय असमानताएं और अधिक बढ़ सकती हैं।

उन्होंने कहा, “संवैधानिक पुनर्संरेखण से हम उन ऐतिहासिक असंतुलनों को दूर कर सकते हैं जो दशकों से बनी हुई हैं। यह न केवल जातीय और सांस्कृतिक समावेशन को बढ़ावा देगा, बल्कि क्षेत्रीय शांति और विकास को भी मजबूत करेगा।”

इसके अलावा सांसदों ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वे पूर्वोत्तर क्षेत्रों के होनहार युवाओं और समुदायों के हितों की रक्षा के लिए संवैधानिक प्रावधानों की पुनरावृत्ति करें और उनकी आवाज़ को संसद एवं राज्य विधानसभाओं में उचित स्थान दें। उन्होंने माना कि विकास और प्रतिनिधित्व में संतुलन बनाए रखना इस क्षेत्र की प्रगति के लिए अत्यंत आवश्यक है।

पूर्वोत्तर भारत की राजनीतिक संरचना को ध्यान में रखते हुए, सांसदों का यह भी कहना था कि यह आवश्यक है कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में क्षेत्रीय विविधता को समुचित महत्व दिया जाए। इससे ही सामाजिक सद्भाव और आर्थिक विकास के रास्ते खुले रहेंगे।

अंत में, उन्होंने जोर दिया कि समावेशन की भावना के साथ संवैधानिक पुनर्संरेखण कार्य ही पूर्वोत्तर के समग्र विकास की दिशा में एक सशक्त कदम होगा, जो सभी समुदायों के हितों की रक्षा करेगा और क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करेगा।