Bengaluru, Karnataka
पूर्व वित्त मंत्री और कर्नाटक के वरिष्ठ नेता डी के शिवकुमार ने हाल ही में दक्षिणी राज्यों के बीच एकजुटता की अपील करते हुए केंद्र सरकार के प्रस्तावित निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन (डेलीमिटेशन) योजना के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने की चेतावनी दी है। उन्होंने इस प्रक्रिया को “दंडात्मक प्रगति” बताया और इसे दक्षिणी राज्यों के हितों के खिलाफ कदम करार दिया।
डी के शिवकुमार ने कहा कि केंद्र सरकार का परिसीमन प्रयास केवल राजनीतिक चुनावों को प्रभावित करने का एक तरीका है, जो दक्षिणी राज्यों की आवाज़ और प्रतिनिधित्व को कमजोर करेगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि राज्य सरकारें और जनता इस मुद्दे पर मिलकर विरोध जताएं ताकि क्षेत्रीय असंतोष को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया जा सके।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, परिसीमन प्रक्रिया को लेकर दक्षिणी राज्यों में चिंता का माहौल है क्योंकि इससे संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं बदले जाने के साथ सत्ता समीकरण भी प्रभावित हो सकते हैं। कर्नाटक के अलावा तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल सहित अन्य दक्षिणी राज्य भी इस पर गहराई से विचार कर रहे हैं।
शिवकुमार ने अपने बयान में कहा, “यह केवल एक राजनीतिक मामला नहीं है, बल्कि दक्षिणी राज्यों की सामाजिक-आर्थिक स्थिरता का सवाल है। हमें मिलकर ऐसे कदमों का विरोध करना होगा जो हमारे अधिकारों और पहचान को खतरे में डालते हैं।” उन्होंने राज्य सरकारों से इस मुद्दे पर सख्त और स्पष्ट राजनीतिक समन्वय की मांग की है।
दक्षिणी राज्यों का यह विरोध इस बात को दर्शाता है कि केंद्र-राज्य संबंधों में खिंचाव और भी गहरा सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि राज्यों ने मिलकर इस मुद्दे पर संयुक्त मोर्चा बनाया तो केंद्र सरकार के लिए कठिन स्थिति बन सकती है। वहीं, केंद्र सरकार का यह मानना है कि परिसीमन प्रक्रिया निष्पक्ष और संवैधानिक दायरे में है, जिसका उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनः निर्धारण है।
प्रत्यक्ष रूप से यह विवाद प्रदेशों की राजनीतिक ताकत, संसदीय सीटों और उनके प्रतिनिधित्व से जुड़ा है। पारंपरिक रूप से राज्यों की राजनीतिक पार्टियां इस मुद्दे को लेकर काफी सक्रिय होती हैं क्योंकि इससे उनके चुनाव लाभ पर प्रभाव पड़ता है।
दक्षिण भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे पर अपनी चिंताएं व्यक्त करते हुए कहा है कि वे किसी भी अत्याचार या अनुचित प्रगति को स्वीकार नहीं करेंगे। इस लड़ाई का परिणाम आने वाले महीनों में स्पष्ट होगा और इसका प्रभाव अगले चुनावों पर भी पड़ेगा।
